आरज़ू (हिन्दी कविता)
* आरज़ू *
ताउम्र कोशिश में रह गया तरन्नुम की तस्दीक करने में-
हक़ झुट की सही तस्दीक आज तक नहीं कर पाया,
मुफलिसी पर अंदाज़े बयान सुना है बहुत शंख से-
पर मुख़लिसी का तजुर्बा करने की फुर्सत न पाया !
राह हमने चुना है जो राहतों का वादा है ज़रुर-
हकीकत यह है की राहभर का इत्तेबा न कर पाया !
अरमां के आहट में रह गया आशिक हो कर-
अखलाक़ सुधारने पर ध्यान न कर पाया !
बारगाहे रब्बे कायनात से बाअज़ीजी आरज़ू है अब-
सिरात़े मुस्ताक़िम पर थम दे मौला- पहचान जो नहीं पाया !
-इक़बाल ।
19-12-2020
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